Book review : My experiments with truth

 गांधी जी की आत्मकथा 'सत्य के मेरे प्रयोग' को पढ़ते हुए जो थोड़ी बहुत समझ बनी उसे संक्षेप में व्यक्त करने की कोशिश कर रहा हूं -

* गांधी जी एक सामान्य विद्यार्थी थे लेकिन उनके संघर्ष, सिद्धांत,माता-पिता के संस्कार,कर्म और अच्छे लोगों का साथ  ने उन्हें महान बनाया।

*गांधी जी अपने परिवारिक परिवेश जुड़े हुए एक धार्मिक व्यक्ति थे और धार्मिक सद्भावना को बढ़ावा देते हुए सभी धर्मों की अच्छी बात को अपनाते थे। इस आत्मकथा में उन्होंने सबसे कड़ी निन्दा ईसाई धर्म की किया है।

*एक जगह उन्होंने बताया है कि बिगड़े हुए दोस्त को सुधारने के लिए लोगों के विरोध के बावजूद भी हमने उससे दोस्ती बनाए रखी कि उसे सुधार दूंगा पर वह सुधरा नहीं और इन्हें ही ग़लत आदतों को सीखा दिया।

* गांधी जी माता पिता की सेवा को परम धर्म मानते थे लेकिन वासना के कारण अंतिम समय में पिता से बात नहीं कर पाए इसका पश्चाताप उन्हें आजीवन रहा।

* गांधी जी विलायत जाकर शाकाहार और मांसाहार में दुविधाग्रस्त जरुर हुए, संगति और वातावरण के प्रभाव में चोरी छुपे अंडे खाकर माता के वचन को तोड़े और बहुत पछताए लेकिन अंततः शाकाहार पर दृढ़ रहे।

*यह भी देखा गया है कि उस समय विलायत की डिग्री मात्र से वकालत का प्रभाव बढ़ जाता था। गांधी जी अपने शर्मिले और ईमानदार स्वभाव के कारण वकालत के पेशा को अपने लिए उचित नहीं समझा। भाई तक के लिए उन्होंने सोर्स पैरबी करना उचित नहीं समझा।

*गांधी जी को गांधी बनाने में दक्षिण अफ्रीका के संघर्षों का बड़ा योगदान है। सेठ अब्दुल्ला के मामले के साथ-साथ गांधी जी ने अफ्रीका में भारतीयों की सामाजिक लड़ाई में प्रसिद्धि प्राप्त की। गांधी जी को आर्थिक मदद देने में अफ्रीका के भारतीय व्यापारियों ने खूब मदद की। गांधी जी ने संगठन बनाना, सत्याग्रह करना और न्याय के मांग की लड़ाई अफ्रीका से सीखा इसमें भारतीय मजदूरों ने उनका बढ़चढ़ कर साथ दिया।

* भारत में यही लड़ाई उन्होंने तिनकठिया के विरोध में चम्पारण से शुरू की पर मुट्ठी भर लोग ही तन मन से उनका साथ दिए ज्यादातर लोग तमाशबीन दिखे। भारतीय अफ्रीकी मजदूरों और व्यापारियों की तरह मदद गांधी जी को भारत में नहीं मिली।

* गांधी जी ने आयुर्वेदिक और उपवास को बेहतर इलाज माना । आपरेशन और शोरबा पीकर ठीक होना उन्हें रास नहीं आया और न ही कस्तुरबा को।

* गांधी जी ने यह भी स्वीकार किया है कि वह कस्तुरबा के साथ न्याय नहीं कर सके क्योंकि उनका पुरूष वर्चस्व उन पर हावी रहा।

* भारत में रेल यात्रा का जो वर्णन उन्होंने किया है वह आज तक नहीं सुधरी अभी भी जनरल डब्बा में लोग वैसे ही व्यवहार और यात्रा करते हैं।

* कांग्रेस के बारे में भी उन्होंने लिखा है कि उसमें मेरा कद बहुत छोटा था। कोई उनकी मानने को तैयार नहीं था। कामचोर और दिखावे वाले अपने को आगे रखते थे, छोटा काम करना कोई नहीं पसंद करता था।

* गांधी जी एक बहुत अच्छी आदत थी कि वह पैखाने की सफाई से लेकर लोगों की सेवा के लिए हर काम बड़े परिश्रम से करते थे।


लिखने को तो बहुत कुछ है पर इतना ही।




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