Book review: Kitne pakistan
कमलेश्वर का यह उपन्यास उपन्यास के क्षेत्र में एक अलग शैली का उपन्यास है, एक तरह से कहिए कि एक अनोखा प्रयोग है। उपन्यास की शुरुआत विद्या और अदीब के अधूरे प्रेम कहानी से होती है जो डूबते उतारते अंत तक चलती रहती है। लेकिन इसके बाद अदीब की अदालत शुरू हो जाती है अर्दली महमूद ने बारी-बारी से समय, इतिहास, भूगोल, दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताओं, बाबर से औरंगजेब तक के सभी बादशाहों, हिंदू राजपूतों, अंग्रेज शासकों, लेखकों, वैज्ञानिकों, राष्ट्राध्यक्षों आदि के मृत आत्माओं को अदीब की अदालत में पेश करता है। ज़िरह होती है सभी अपने किए को उजागर करते हैं और पश्चाताप भी करते हैं। इसमें बहुत सारे तथ्य पाठक को सोचने पर मजबूर करते हैं। सत्ता और स्वार्थ में सब धोखेबाज हैं जो अपना वर्चस्व खोना नहीं चाहते। इसके चक्कर में तबाही झेली है आम जनता। पूरे विश्व में धर्म और विश्वास के नाम पर लोगों को बांटा और लड़ाया जा रहा है। हर जगह धर्मांधता का परिणाम बुरा हुआ है। धर्म में बहुत ज्यादा घुसना आम जन के लिए फायदेमंद नहीं है। धर्म और नफ़रत के आधार पर कितने पाकिस्तान बनाओगे? सभ्यता के नाम पर सभ्य नागरिक का चोला...